नोएडा DM मेधा रूपम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित, ₹5 लाख वसूली पर उठाया सवाल

नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम से जुड़े आकृति चौधरी NSA हिरासत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब हिरासत की पूरी प्रक्रिया कई अधिकारियों और संस्थाओं से होकर गुजरी, तो व्यक्तिगत रूप से DM से ₹5 लाख की वसूली क्यों की जाए।
सुप्रीम कोर्ट में मेधा रूपम की याचिका पर सुनवाई
नोएडा यानी गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम से जुड़े आकृति चौधरी NSA हिरासत मामले में बुधवार, 23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया। इसका मतलब है कि अदालत ने फिलहाल अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2 सितंबर के आदेश से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय इतिहास स्नातक आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत हिरासत को रद्द कर दिया था। साथ ही ₹5 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था, जिसकी वसूली अधिकारियों से करने की बात कही गई थी। मेधा रूपम ने इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाया व्यक्तिगत जिम्मेदारी का सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह रहा कि जब NSA के तहत हिरासत की प्रक्रिया कई स्तरों से होकर गुजरती है, तो क्या जिलाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से ₹5 लाख की आर्थिक जिम्मेदारी के लिए अलग किया जा सकता है।
अदालत ने इस बात पर सवाल किया कि यदि निर्णय लेने की प्रक्रिया में कई अधिकारी और संस्थाएं शामिल थीं, तो केवल DM को व्यक्तिगत आर्थिक जिम्मेदारी के लिए क्यों चुना जाए। रिपोर्टों के अनुसार, कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया कि पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग प्रशासनिक स्तरों की भूमिका थी।
NSA कार्रवाई में कई स्तरों की भूमिका
सुनवाई के दौरान मेधा रूपम की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाईकोर्ट के आदेश पर आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि जिलाधिकारी के खिलाफ बिना नोटिस सख्त टिप्पणियां की गईं और ₹5 लाख की व्यक्तिगत देनदारी तय की गई।
वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी की ओर से दलील दी गई कि NSA के तहत कार्रवाई किसी एक अधिकारी के स्तर पर पूरी नहीं होती। उनके अनुसार, प्रक्रिया में थाना स्तर से रिपोर्ट, पुलिस अधिकारियों की जांच और आगे के प्रशासनिक स्तर शामिल होते हैं। इसके बाद मामला NSA की एडवाइजरी प्रक्रिया से भी गुजरता है।
यही बिंदु सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में महत्वपूर्ण रहा। अदालत के सामने यह सवाल था कि यदि पूरी निर्णय प्रक्रिया एक तय प्रशासनिक व्यवस्था के तहत आगे बढ़ी, तो व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करने का आधार क्या होना चाहिए।
आकृति चौधरी की हिरासत का क्या है मामला?
आकृति चौधरी को नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामले में NSA के तहत हिरासत में लिया गया था। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी हिरासत के आदेश को रद्द कर दिया और ₹5 लाख मुआवजे का निर्देश दिया। हाईकोर्ट के आदेश में अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी टिप्पणियां की गई थीं।
मेधा रूपम ने हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रखा है।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ओर से अंतिम फैसला नहीं आया है। इसलिए ₹5 लाख की व्यक्तिगत वसूली और हाईकोर्ट की टिप्पणियों को लेकर अंतिम स्थिति आदेश आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी प्रश्न यह है कि बहुस्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया में किसी एक अधिकारी की व्यक्तिगत आर्थिक जिम्मेदारी किस आधार पर तय की जा सकती है। अदालत का अंतिम आदेश इस मामले की आगे की दिशा तय करेगा।
Shivam Vajpai
Correspondent · GroundWireDaily Media
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