Warning Sign for India? देश की जन्म दर पहली बार रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे, दिल्ली सबसे आगे

भारत में पहली बार कुल प्रजनन दर (TFR) रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे पहुंचकर 1.9 दर्ज की गई है। राजधानी दिल्ली का फर्टिलिटी रेट केवल 1.2 है, जो देश में सबसे कम है। विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षा, शहरीकरण, बढ़ती लागत और बदलती जीवनशैली इसके प्रमुख कारण हैं। इससे भविष्य में जनसंख्या संरचना और अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।
नई दिल्ली। भारत की जनसांख्यिकीय तस्वीर में एक बड़ा बदलाव दर्ज किया गया है। देश का कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate - TFR) पहली बार रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे पहुंच गया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत का TFR घटकर 1.9 रह गया है, जो एक दशक पहले 2.3 था। यह बदलाव भविष्य में देश की आबादी, श्रमशक्ति और आर्थिक विकास पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।
क्या होता है रिप्लेसमेंट लेवल?
रिप्लेसमेंट लेवल वह स्तर माना जाता है जिस पर एक पीढ़ी खुद को अगली पीढ़ी में संख्या के हिसाब से बनाए रख सकती है। आमतौर पर इसे 2.1 बच्चों प्रति महिला माना जाता है। जब किसी देश का फर्टिलिटी रेट इससे नीचे चला जाता है, तो लंबे समय में आबादी की वृद्धि धीमी पड़ सकती है या स्थिर हो सकती है।
दिल्ली में सबसे कम फर्टिलिटी रेट
देश की राजधानी दिल्ली का फर्टिलिटी रेट केवल 1.2 दर्ज किया गया है, जो भारत में सबसे कम है। यह आंकड़ा कई विकसित देशों के स्तर के बराबर या उससे भी कम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि शहरीकरण, उच्च शिक्षा, करियर प्राथमिकताएं, बढ़ती जीवन-यापन लागत और बदलती पारिवारिक सोच इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
किन राज्यों में अब भी अधिक जन्म दर?
हालांकि देश का औसत फर्टिलिटी रेट 1.9 तक पहुंच गया है, लेकिन कुछ राज्यों में अभी भी यह रिप्लेसमेंट लेवल से ऊपर है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ ऐसे राज्यों में शामिल हैं जहां जन्म दर अभी भी अपेक्षाकृत अधिक बनी हुई है।
क्यों घट रही है जन्म दर?
जनसंख्या विशेषज्ञों के अनुसार फर्टिलिटी रेट में गिरावट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं:
- महिलाओं की शिक्षा में वृद्धि
- शहरीकरण और बदलती जीवनशैली
- परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता
- करियर और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता
- बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत
- विवाह और मातृत्व की बढ़ती औसत आयु
इन कारणों ने परिवार के आकार को छोटा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है।
क्या यह चिंता का विषय है?
विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। एक ओर कम जन्म दर से संसाधनों पर दबाव कम हो सकता है, वहीं दूसरी ओर लंबे समय में वृद्ध आबादी बढ़ने और कामकाजी आयु वर्ग के घटने का खतरा भी पैदा हो सकता है। जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों में इसी तरह की चुनौती पहले से देखी जा रही है।
भारत के लिए आगे क्या?
भारत अभी भी दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है और उसके पास बड़ा कार्यबल मौजूद है। हालांकि जनसांख्यिकीय विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सरकार को रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं, बुजुर्ग आबादी की देखभाल और उत्पादकता बढ़ाने पर अधिक ध्यान देना होगा।
फर्टिलिटी रेट का 1.9 तक पहुंचना केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि भारतीय समाज तेजी से बदल रहा है। आने वाले दशकों में इसका असर देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक संरचना और विकास नीतियों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।
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Correspondent · GroundWireDaily Media
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